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Thursday, February 16, 2012

"धुंध"


ख्वाबों का उतरना बाकी था,

कि आँखों में अब भी नमी बनी रही...

जिंदगी कुछ सूखे पत्तों सी....

गिरती साखों से लिपटी रही..!!

चुप रहे कुछ पल तो कुछ और मिल गए..

सिलसिले बने तो बनते रह गए....

वो घड़ी खामोश बैठे, तो सवाल वाजिफ था

हम भी चुप रहे तो वो दंग रह गए...

आस-पास ही कोई तस्वीर दिखाई देती है...

धुंध है सारे लम्हों में, पर तकदीर साथ बैठी है..

कोई अक्सर दरवाजों पर दस्तक दे जाता है ...

फिर क्यूँ घर के शोर में कोई आवाज नही आती है..

सवाल अब ये है जिंदगी तुमसे कि,

तुम्हारे बीत जाने की क्यूँ अब तक, कोई रात नही आती है !!!!

Friday, November 18, 2011

"चाहूँ कभी"


चाहूँ कभी बचपन की वो यादें, पुरानी खरीद लू मै,
या जवानी की वो बहकती, चंचल रूमानी खरीद लू मै,
वो एहसास, वो दरियादिली की, तुमको लगे कभी प्यास तो,
जिस्म का कतरा कतरा लहू बेच, सब पानी खरीद लू मै
मिलता था सुकूं दिल को ,था वचपन मेँ गुमां जिसपर ,
वो खिलौने, गुड्डे-गुडिया साथ रानी खरीद लूँ मैँ ।
जो हसती थी मेरी अम्मा ,था बाबूजी का झूठा रुठना ,
वो झगड़े, वो कट्टिस, बेवक्त शैतानी खरीद लूँ मैँ । ।
काश इक बार फिर से गुजरें वो बसंत की बहारें,
तो पतझड़ की सारी जवानी खरीद लूं मैं !!!!
सोचता हूँ कभी क्षितिज के हर छोर पर जाकर
गर बचपन लौट आये, दादी नानी की सारी कहानी खरीद लू मै, !
तू रहता है सामने तो इबादत सी चलती है साथ,
तू न हो कभी परेशां, अल्लाह की सारी मेहरबानी खरीद लू मै !
आइना क्या बताता मुझे तेरे चेहरे की कभी कोई मासूमियत
तेरे लबों की उस नाजुकी के लिए, फूलों से नूरानी खरीद लू मै!!
चलना मुझे भी था हर कदम साथ, हमदम बनकर तुम्हारा
रास्ते रुके ना कभी मंजिलों से पहले , नदियों की रवानी खरीद लू मै !
इतने परिचय देकर संतोष कहाँ है "आशुतोष"
रिक्त बीती है कितनी रातें, इक रात कोई पुरानी खरीद लू मै,
कोई भला क्यूँ पहरा करता तुम्हे यूँ नज़रबंद करके
तुम सदा होशमंद रहो, दुनिया से सारी बदगुमानी खरीद लू मै !
ना रहा कोई सिलसिला तुझसे दूर जाने का कभी
मैंने भी करवटों से छुपकर तारे देखे हैं
नूर चेहरे का परदे में तेरा कब तक रहेगा अब...
तू कहे तो फिर से, एक जवानी खरीद लू मैं....!!

Wednesday, July 20, 2011

कल रात भीगे कुछ ....




कल रात की बारिश में दिखे कुछ भीगे से साये थे

देखा आँगन में बिखरे पत्तों ने भी कुछ ऐसे ही रंग चढ़ाये थे

बरखा के मध्यम शोर ने बचपन में ऐसे ही

ना जाने कितने ही गिरती बूंदों के पल चुराए थे

शब्द कुछ दबी आवाजों के खुलकर निखरते देखे थे

तो कभी कागजों के कितने ही ढेर नाव के आकार में पाए थे

शाम तक नजरे दौडाकार चारों ओर रोशनी को टटोला

तो चंद जो रह गए थे वो उसके ही कुछ हमसाये थे

भूल गए कि कुछ वक़्त पहले ही तो

चाँद को देखकर ये बादल तबियत से छाए थे

कभी खुद को ढूढ़ पाने कि कशिश,

तो कभी सब भूल जाने कि कोशिश,

ये अरमान तो बस यूँ ही मौसम देखकर

आज अचानक ही दिल बहलाने को आये थे..!!!

Tuesday, April 19, 2011

Monday, January 24, 2011

ये सवेरा, कितना मेरा?



सूरज की पहली किरण आज


मुझे छूते हुये मग़रिब चली गयी,


एक बीती शाम के दरमियाँ


इस अंतर्द्वंद का सवेरा हो गया....


पुलकित से मन कुछ उतावले ,


कुछ व्याकुल से बैठे थे बाहर


मुक़र्रर करने को एक जगह जहाँ,


सुकून से रोटियां बैठकर खायी जाये....


मौके पर मिला था सरसों का तेल,


और चपटने के लिए एक ढेली नमक


पुरानी यादों का तिनका तोड़कर सोचा,


क्यों न बचपन थोडा फिर जिया जाये...


जाने कितने ही छोटे-छोटे से द्वीप,


मन के अन्दर मरघट बने बैठे थे


कही से कोई आता और यूँ ही


लगातार कई दरवाजे खुले छोड़ जाता ...


मगलूब हो गए थे इसी कशमकश में,


जब देखा वापस तो मन का कोई मुहाफ़िज़ ना बचा...


उस पर इन हवाओं के हलके झोंकों ने भी


कल एक अचानक तूफ़ान था ला छोड़ा....


सिमटकर जब बैठे खुद को अपने आप


गर्म करने कि आस में, उसी राह में,


अपना बताकर लोगों ने


वाकये को बिना वज़ह सर्द कर छोड़ा....


आज वक़्त हम पर मेहरबान है


तो "हम" के कई हिस्से हो गए...


"मै" का हिस्सा ग़र सिर्फ मै था तो,


ये हिस्सा था क्यों इतना थोडा.....


इरादे कही रिक्त थे तो कही,


उनकी जगह ना पायी मुकम्मल सी


कोशिश की थी समझ लेने की,


पर समझ न आया थोडा-थोडा....


आदतों में कभी इतना कडवापन


शायद ही टटोला था जीवन में....


बस मुस्कुराते हुये कुछ शब्द निश्छल


यूँ ही निकल जाते थे बेपरवाह से ,


सच है कि तर्ज-ए-ज़िन्दगी पर डगमगा से


गए थे कभी ये बे-रस्ते से कदम,


इन भटके कदमो से ही मंजिलों को पाने का


कोशिश का एक पुल मैंने ही था कभी जोड़ा.....


जो लकीर खिची है आज आसमान तक,


रंग-बिरंगी घर के बाहर देखने पर


कभी काले धुएं का अम्बार सा दिखता था,


धुंधला कर के मेरी इन अंगार आँखों को..


सपनो से लौटकर अब जल्द खुलती है,


मेरी आँखे सिर्फ एक चादर हटाकर ..


नियति है कि बड़ी मुश्किल से हटा है


ये "संभव-असंभव" का कांटे सा मुखौटा ....


कितनी अंकित तस्वीरे थी मन में


जो दिन रात बना करती थी पल-पल


उधड गए है धागे कुछ परिवर्तन के


तिरस्कार रचे हैं कुछ जीवन के...


रात की कोई गाडी स्टेशन पर


फिर रुकी है घर के पीछे....


शायद कोहरा है छट रहा


साफ़ है रस्ता अब थोडा-थोडा !!!!


"एक प्रयास "

Friday, December 17, 2010

दुविधा


दुविधा है की सिर्फ तुम हो इस पार,
क्यूंकि उस पार सरगम का कोई साज़ नहीं था ...
दिन ढलने से पहले ही आज ओढ़ ली थी मैंने चादर,
मग़र इस सर्द रात का मेरे लिए कोई अहसास नहीं था !!!
मशक्कत से रोटी के लिए पैसे जुटाए थे,
मग़र क़स्बे में खुली आज कोई दुकान नही थी ...
मंहगाई की मार से जीवित रह तो गए ,
पर ज़िंदा जज्बातों में आज कोई जान नही थी ...
सुर की साधना, पुष्प की अभिलाषा करते
आज हम ना जाने कितने बड़े हो गए...
ज़ईफ़ ऐनकों से वही चेहरे ना जाने कितनी दूर
और दूर के चेहरे आज कितने पास हो गए !!
रात को नींद ना आने का कारण डॉक्टर ने बताया तो था,
फिर भी उन अनजाने चेहरों के पीछे
सात दिन तक आँखे ना खुली ,
अरबा में पड़ी गंगाजल की शीशी
के भी ख़तम हो चुके थे छीटें !!!
कुछ वाकयात बाहर के थे कुछ घर के अन्दर ही
दुविधा की पेटी में साँस लेते बैठे थे..
कुछ सुना तो पन्त जी की इकलौती बेटी की
चर्चा करते कुछ लोग आगन में बैठे थे...
"होना क्या था" को लेकर इतनी बड़ी बहस मैंने
शायद ही कभी देखी थी टूटे झरोखों से ...
अम्मा को भी फकत की फुर्सत थी खानसामे से,
कि इस बहस में भिड़ती रोज के लोगों से......
मुन्ना (बड़के का बेटा ) अपनी थाली में
गरम रोटी के इंतज़ार में अम्मा के पास दो घंटे से बैठा रहा....
और अम्मा का चूल्हा रात के नौ बजे तक
गीली लकड़ियों से सुन-सुन कर जलता रहा.......
अपने पैरों के अभाव में खटिया पर
मेरे शरीर का विस्तार दो साल से कुछ कम सा था ...
वैद्य की खुराक,पत्तियों के लेप और
मेरी पत्नी की दुआ का असर ही एक मरहम सा था....
बबलू को २ साल का होता देख लगा कि
मेरे पैरों का असर अब इतना बेअसर नहीं रहा....
फिर भी उसे अपनी गोद में लेकर चलने का सबब,
अंतर्मन में वर्तमान से जूझता रहा !!
खर्चन की लकड़ी को अरहरे से तोड़
मुन्ना गाली देता हुआ जब अन्दर तक जाता था,
वक़्त फिर से मुझे उस दुविधा के मोड़ पर
तन्हा छोड़ दिल को छलनी कर जाता था...
मेरे कुछ अंतिम सवाल होकर भी मुझे सबके जवाबों की
एक लम्बी फेहरिस्त बनानी पड़ती थी..
अपने पैंतीस साल के अहसास को लेकर
घर में ही कितनी शिकस्त खानी पड़ती थी......
बड़के की दूसरी शादी पर अम्मा को
शायद ही कभी इतना रोना आया था ....
पट्टेदारों से सुना था कि इस बार भी बड़के के घर
ना के बराबर "सोना" आया था......
अम्मा गृहस्ती में सुलगकर पेंशन से
घर चलाने की ज़द्दोज़हद में लगी है.......
मुझे याद है मेरी शादी के बक्से में
उसकी दी हुई "मोहर" आज भी रखी है.....
अम्मा बड़के के पीछे निराधार जब कुछ कहती है
तो रो पड़ता हूँ मैं भी चादर के नीचे..
अस्तित्व के सहारे जब उठना नहीं होता
तो देखता हूँ अपनी बैसाखियों को नीचे....
कुंठित मन से शालीनता का आँचल फैलाकर
अम्मा आज भी व्यस्त रहती है.....
मेरे साथ हुए हादसे को भूल कर वो आज भी
मेरे सोने के बाद रोया करती है...
दिन-रात का अंतर महसूस नहीं कर पाता
तो अम्मा को बुला लेता हूँ.......
इस दुविधा में अपने आगे का जीवन भी मैं आज
अपनी अम्मा को समर्पित करता हूँ.......













--
**cheers**
Ajay Gautam
9313077477

Friday, July 3, 2009

****** अपना समझकर.....*******


दूर क्यूँ वो चला आया , अपने हर रास्ते बदलकर
क्यूँ नया सफर मिल गया उसे, उसकी बाहों से लिपटकर,
क्यूँ जिंदगी तू सवाल करती है उससे यूँ रह-रहकर,,
जब साए से बंधी है आवाज उसकी, तुझसे यूँ हरपल सिमटकर !!


कर देती है तू फिर से तन्हा , जब याद उसको वो करता है,
फिर याद आने पर तू उसे, क्यूँ ऐसे मनाया करती है,,
जिंदगी तू कुछ भी कहे वो आज भी अनजान है,
क्यूँ रूठकर अगले ही पल तू उसको मनाया करती है ,,,,
पहलू में बैठे है तेरे कुछ रंग ऐसे फिर चेहरे बदलकर,
कह दे उनसे प्यार कर लें , ज़रा जाएँ फिर संभलकर !!!!


क्या
जाने तू ये जिंदगी , ख़ुद से चुराता पल वो इतने,
भवरों को फिर से सोता हुआ, अब तक देखा क्यूँ किसी ने,
कह देती हो आंखों से ऐसे, कि मैं कुछ समझ पाऊंगा ,
पर ये बता तू जिंदगी कि कल मैं उसका "कल" कैसे हों पाऊंगा....
आवाज आती है रातों में जब, उसकी एक आवाज सुनकर,
सर्द रात गुजर जाती है , उसको फिर से पलकों में सजाकर !!!!



प्यार
है उससे अब ये मैं , इन सुर्ख होठों से क्यूँ कहूँ ,
जब वो वजह हो मेरी , फिर ये वजह मैं क्यूँ कहूँ,,
सोचता हूँ बस यूँ ही, ग़र थोड़ा सहारा मिल जाता,
मैं इस सफर में अब कहीं दूर तक निकल जाता,,
कह देना उससे वो चुप रहे, मेरी भी बातें थोडी सुनकर,
मेरी सिसकियाँ तो ढल गई, उसको कबका अपना समझकर !!!